Saturday, August 31, 2013

तुम…


मन के मानसरोवर में
एक हलचल सी आई तुम
बन तरंग हर किनारे तक
धीमे धीमे इठलाई तुम

नीरव शांत इस सरोवर में
जो था ज्ञान का पानी था
किसी उषा को ,बन प्रेम-कमल
ह्रदय स्थल पर खिल आई तुम

ओस बूँद- सा बिखर गया
पंक दलों की कोमल बाहों में
और बिखर कर निखर गया
मृगनैनी तेरी निगाहों में

उलझे केसों की छाया में  
हर ताप मेरा हर लो
कंचन - सी पावन देह के
आलिंगन में भर लो
तेरे चंचल ये नैननक्स

अनंत उज्वल हर रूप-अक्स
आज देख देख कर तुम्हे ऊब जाने दो
बेपनाह खूबसूरती में डूब जाने दो
मुझसे अलग हो कर भी
हो मेरी ही परछाई तुम

मन के मानसरोवर में एक हलचल सी आई तुम ....




Wednesday, January 16, 2013

"अधुरा प्यार"



दिल चाहता है -


किसी बादल की तरह 
न्योछावर कर दूँ हर बूँद 
बह जाऊं तेरी हर रग में 
इतना की कोई प्यास  न रहे
 हो जाऊं तेरा इस कदर 
की  खुद  का एहसास न रहे  

फिर शायद ये तू कहे कि
ह्रदय-विजित हूँ मैं 
प्यार पूरा है मेरा तेरे लिए
पर फिर देखता हूँ खुद को 
कि एक रेस  का हिस्सा  हूँ मैं 
दौड़ रहा हूँ रेस अधूरी है , पर 
जो जीता तो अंतिम लकीर पर लिखा होगा -FINISHED 

मेरी जीत मेरी हार ही है 
मेरा प्यार अधुरा था और अधुरा है तेरे लिए .....

Thursday, May 17, 2012

तू मेरी या मैं तेरा ?


जेठ की धूप सी तू कभी 

जलती,जलाती, तडपती ,तडपाती 
मुहब्बत की हर बूँद को तरसाती  
और कभी  सावन के बादल की तरह 
अपना सब कुछ निःस्वार्थ बरसाती 
क्यूँ बरसी तू कि रग -रग में  बह गयी 
जो जुबान से न कह सकी 
तेरी खामोशियाँ कह गयी 
 ज़मीन पे पड़े धुल कि तरह ही सही
पर तेरे प्रेम जल में मिल चूका हूँ मैं
ये फर्क कैसे करूँ कि -
तू मेरी या मैं तेरा ?
तय कर लिया है कि 
जो पहुंचा तो तेरे साथ ही
 पहुंचूंगा समुन्दर तक
या फिर विरह के जेठ  में 
बूँद बूँद फिर से बादल होगी  
और जर्रा-जर्रा , धुल-धुल पुकारेगी उसे 
तरस के अनेक  होने के लिए
बरस के एक होने के लिए ....